रमज़ान का मुबारक महीना आज से शुरू

रमज़ान का मुबारक महीना आज से शुरू

Feb 19, 2026 - 11:35
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रमज़ान का मुबारक महीना आज से शुरू

रमज़ान का मुबारक महीना आज से शुरू
— आफ़ताब अहमद, प्रयागराज

रहमत, बरकत और इबादत का पाक महीना
आज से रहमतों और बरकतों का मुकद्दस महीना रमज़ानुल मुबारक (पवित्र रमज़ान) शुरू हो रहा है। इस्लाम में रमज़ान को रहमत (करुणा), मग़फ़िरत (क्षमा) और निजात (राहत/उद्धार) का महीना क़रार दिया गया है। यह महीना सब्र (धैर्य), तक़वा (ईश्वरभय), इबादत (उपासना) और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ (मानव सेवा) का पैग़ाम देता है।

दुनिया भर के मुसलमान रोज़ा रखकर अल्लाह तआला की रज़ा हासिल करने और अपनी ज़िंदगी को पाकीज़ा बनाने की कोशिश करते हैं। रमज़ान इस्लामी क़मरी साल (चंद्र कैलेंडर) का नौवां महीना है। इसी मुकद्दस महीने में कुरआन मजीद (पवित्र कुरआन) का नुज़ूल (अवतरण) हुआ।

रोज़ेदार सुबह सादिक से पहले सहरी (सहूर – सुबह का भोजन) करते हैं और ग़ुरूब-ए-आफ़्ताब (सूर्यास्त) के बाद इफ्तार / आफ़्तारी (रोज़ा खोलना) के साथ रोज़ा खोलते हैं। पूरे दिन खाने-पीने और तमाम बुराइयों से परहेज़ करते हुए सब्र (धैर्य) व तहम्मुल (सहनशीलता) का मुज़ाहिरा करते हैं।

सहरी की फ़ज़ीलत
सहरी करना सुन्नत (हदीस अनुसार अच्छा काम) है और हदीस शरीफ़ में इसकी बड़ी फ़ज़ीलत बयान हुई है। फ़रमाया गया कि “सहरी में बरकत (अधिक लाभ/आशीर्वाद) है।” यह जिस्मानी क़ुव्वत (शारीरिक ताक़त) और रूहानी ताक़त (आध्यात्मिक शक्ति) दोनों प्रदान करती है।

इफ्तार की फ़ज़ीलत
इफ्तार का वक़्त दुआओं की क़ुबूलियत (प्रार्थनाओं के स्वीकार होने) का खास लम्हा माना गया है। सादगी और शुक्रगुज़ारी के साथ खजूर और पानी से रोज़ा खोलना सुन्नत है। रोज़ेदार को इफ्तार कराने वाले के लिए भी अज़ीम सवाब (पुण्य) की बशारत दी गई है। यह अमल समाज में मोहब्बत (प्यार), हमदर्दी (सहानुभूति) और भाईचारे (सौहार्द) को फ़रोग़ देता है।

तरावीह की अहमियत
रमज़ान की खास इबादतों में नमाज़-ए-तरावीह (विशेष रात की नमाज़) को अहम मुकाम हासिल है। नमाज़-ए-ईशा के बाद मसाजिद में जमाअत के साथ तरावीह अदा की जाती है, जिसमें कुरआन मजीद की तिलावत (पाठ / पढ़ाई) की जाती है। पूरे महीने में कुरआन पाक मुकम्मल किया जाता है। यह रूहानी फ़ज़ा (आध्यात्मिक माहौल) ईमान को ताज़गी (स्फूर्ति) बख्शती है और दिलों को जोड़ने का सबब बनती है।

रमज़ान महज़ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने अफ़कार (विचार), अल्फ़ाज़ (शब्द) और आमाल (कर्म) को दुरुस्त करने का महीना है। यह हमें गुनाहों से तौबा (पश्चाताप), ज़कात (दान) व सदक़ात (दान/सहायता) अदा करने और ग़रीबों व मोहताजों (जरूरतमंदों) की मदद करने की तरग़ीब देता है।

दुआ है कि यह मुकद्दस महीना तमाम अहल-ए-वतन (देशवासियों) के लिए अमन-ओ-अमान (शांति), खुशहाली और इत्तेहाद (एकता) का पैग़ाम लेकर आए और हमारी इबादतों को शरफ़-ए-क़ुबूलियत (क़ुबूल होने का सम्मान) बख्शे। आमीन।

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